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कुछ ताजा खबरें

Wednesday, November 11, 2009

कृषि और किसान को खोखला करते रसायन

सचिन कुमार जैन

खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशक के बेतहाशा उपयोग से पैदा हो रहे खतरों के अत्यधिक प्रचार के बावजूद मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के पेटलावद ब्लॉक में एक हेक्टेयर खेत में 600 से 800 किलोगा्रम रासायनिक उर्वरक और 5 से 10 लीटर रासायनिक कीटनाशक छिडके जा रहे हैं।
झाबुआ जिले के इस इलाके के किसानों द्वारा कपास टमाटर मिर्ची जैसी नकदी फसलों में उपयोग में लाए जा रहे रसायनों की यह मात्रा भारत के औसत उपयोग से 6 से 8 गुना और मध्यप्रदेश के औसत से 10 से 12 गुना है।
इतना ही नहीं देश में यह रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करके सबसे ज्यादा उत्पादन करने वाले राज्य पंजाब 209.59 किलो, आंध्रप्रदेश 219.48 किलो और तमिलनाडु 186.68 किलो से भी कई गुना ज्यादा है। बेहद ऊंची लागत वाली इस नकद खेती का विस्तार होने से केवल किसानों पर सालाना आय से चार गुना ज्यादा कर्ज हो गया है बल्कि खेतों के उपजाऊपन पर भी नकारात्मक असर पड़ा है।

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Tuesday, November 10, 2009

बलि चढ़ी दाल

सुनील
दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ — कुछ साल पहले किसी बम्बंईया फिल्मत के लिए यह गीत लिखने वाले गीतकार ने कभी सोचा भी न होगा कि जो दाल हमारे सादे भोजन का हिस्साो है, एक दिन वह इतनी महंगी हो जाएगी। आज अरहर की दाल 85 से 90 रुपए किलो हो चली है। पांच साल पहले यह 34 रुपए किलो थी। ढाई गुने से भी ज्याकदा उसके दाम बढ़ गए हैं। चने को ही लें एक जमाना था जब चना अनाज से सस्ताी होता था। अन्नक का अभाव होने पर लोग चने खाकर गुजारा करते थे। आज चने के दाम अनाज के दुगने से भी ज्याअदा हैं। इस सबके लिए सरकार कभी जमाखोरी और कभी फसल बिगड़ने को दोष दे रही है। लेकिन बात इतनी सरल, सतही और तात्का लिक नहीं है।
हमारा देश दालों का प्रमुख उत्पाोदक देश है। यहां तुअर अरहर, चना, मूंग, मसूर, उड़द, मोगर, चवला, सेम, बटरा, तिवड़ा, खेसारी आदि अनेक तरह की दालें पैदा होती हैं। ये देश की खेती, अर्थव्यहवस्थाभ, खुराक, परंपरा, संस्कृाति और जनजीवन का अभिन्नक हिस्सान हैं। अलग-अलग भाषाओं-बोलियों में उनके कई नाम हैं। कई मुहावरे व कहावतें उनको लेकर प्रचलित हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर उनकी खेती बहुत कम होती है। इसलिए जब देश में दालों की कमी हो तो उसे आयातों से पूरा करना भी आसान नहीं है।

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Friday, November 6, 2009

गेहूं का समर्थन मूल्य 1100 रुपए होगा

दिल्ली 05 नवम्बर, 2009 केन्द्र सरकार ने गुरुवार को गेहूं सहित रबी की कई फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ा दिया। इसके तहत सरकार ने गेहूं की एमएसपी 20 रुपए और चना की एमएसपी 30 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ा दी है।

इसके साथ ही सरकार ने जौ और सैफफ्लावर जैसी दूसरी रबी फसलों की एमएसपी भी बढ़ा दी है। एमएसपी बढ़ाने का फैसला प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीईए) ने लिया। बैठक के बाद गृह मंत्री पी चिदंबरम ने बताया, ‘पिछले साल की तुलना में गेहूं की एमएसपी में 20 रुपए का इजाफा कर इसे 1,100 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित कर दिया गया है। गेहूं का समर्थन मूल्य पहले 1080 रूपए प्रति क्विंटल था। सरकार ने रबी फसलों पर कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की रिपोर्ट स्वीकार कर ली।
पिछले साल सरकार ने गेहूं की एमएसपी 80 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाई थी, जिससे गेहूं की रेकॉर्ड 8.05 करोड़ टन पैदावार हुई थी। 2009-10 सीजन के दौरान सरकार का लक्ष्य 8.2 करोड़ टन गेहूं पैदावार का है। सीसीईए ने पिछले साल की तुलना में इस साल चना की एमएसपी 30 रुपए बढ़ाकर 1,760 रुपए प्रति क्विंटल कर दी है। इसी तरफ सैफफ्लावर की एमएसपी 30 रुपए बढ़ाकर 1,680 रुपए प्रति क्विंटल और जौ की एमसपी 70 रुपए बढ़ाकर 750 रुपए प्रति क्विंटल कर दी गई है। सरकार ने तिलहन और मसूर की एमएसपी नहीं बढ़ाने का फैसला किया है। तिलहन की एमएसपी 1,830 रुपए प्रति क्विंटल और मसूर की एमएसपी 1,870 रुपए प्रति क्विंटल पर ही बरकरार है

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Friday, July 31, 2009

जैविक खेती से किसानों में खुशी

साठ के दशक में शुरू हुई हरित क्रांति के बाद देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर ही नहीं बल्कि अग्रणी देश भी बन गया। हरित क्रांति के नाम पर खेती में कीटनाशकों और खाद के रूप में रसायनों के जमकर हुए प्रयोग ने हमारे किसानों का उत्पादन तो बढ़ाया लेकिन साथ ही हमारी प्राकृतिक संपदा का भरपूर दोहन भी किया। धीरे धीरे बंजर हुई ज़मीन का उत्पादन मात्रा में कम और निम्न गुणवत्ता वाला होने लगा और भारी कर्ज़ से दबने के बाद परेशान किसानों ने आत्महत्याएं करनी शुरू कर दीं। देश के नीति निर्धारकों को इस विपदा से निपटने का एकमात्र उपाय नज़र आया रासायनिक खेती के बजाय जैविक खेती कराना।

मिट्टी को जीवन यापन का आधार मानने वाले भारत के लिए जैविक खेती कोई नई बात नहीं है। देश की पुरानी पारंपरिक खेती में भी गाय और दूसरे पालतू पशुओं के गोबर से बनी खाद का उर्वरकों के रूप में इस्तेमाल होता था। पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए लाभदायक इस जैविक खेती ने फिर लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। जैविक खेती में रसायनों का प्रयोग करते हुए फसलों और मिट्टी को फायदा पहुंचाने वाले कृमियों और सूक्ष्म जीवों का संरक्षण होता है जिससे जमीन की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। जैविक खेती रसायनों से होने वाले दुष्प्रभावों से पर्यावरण को बचाती है और इसके माध्यम से जैव पर्यावरण का भी संरक्षण होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि जैविक खेती के जरिये ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में करीब 35 फीसदी की कमी की जा सकती है।

किसानों की सहकारी संस्था नैफ़ेड और आईटीएस यानी इंटरनेशनल ट्रेसिएबिलिटी सिस्टम्स लिमिटेड मिलकर पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप में राष्ट्रीय बागवानी मिशन और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत उत्तर प्रदेश के 25 ज़िलों में 41 हज़ार हैक्टेयर क्षेत्र में जैविक खेती परियोजना चला रहे हैं। जैविक खेती का प्रमाणीकरण कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण यानी एपेडा से मान्यताप्राप्त इंडोसर्ट और एसजीएस संस्थाएं कर रही हैं।

राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत उत्तर प्रदेश के 25 ज़िलों में 15 हज़ार हैक्टेयर क्षेत्रफल में 9225 पंजीकृत किसानों के खेतों पर फल और सब्ज़ियों की खेती अन्य फसल चक्रों में की जा रही है, जबकि ऱाष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत उत्तर प्रदेश के 24 ज़िलों में 26 हज़ार हैक्टेयर क्षेत्रफल में 12790 पंजीकृत किसानों के खेतों पर खाद्य, तिलहन और दलहन की खेती की जा रही है।

इन योजनाओं के तहत इन संस्थाओं के माध्यम से किसानों के समूहों को पहले जैविक फसल उत्पादन के लिए पंजीकृत किया जाता है फिर उन्हें उत्पादन की जैविक विधियों का प्रशिक्षण दिया जाता है। जैविक खेती प्रणाली अपनाने के लिए प्रेरित करने के साथ-साथ किसानों को कृमि खाद इकाई, जैविक खेती तथा जैविक प्रमाणीकरण के बारे में भी प्रशिक्षित किया जाता है। किसानों के खेतों से मिट्टी के नमूने लेकर भूमि स्वास्थ्य की जाँच करवाई जाती है। इन नमूनों से मिट्टी के लिए लाभदायक सूक्ष्म जीवाणुओं को अलग करके जैविक कल्चर तैयार किया जाता है। यह जैविक कल्चर किसानों में वितरित किया जाता है जिसे किसान गोबर की सड़ी खाद के साथ मिलाकर खेत में इस्तेमाल करते हैं। इससे भूमि की उर्वरा शक्ति और साथ ही फसल उत्पादन भी बढ़ता है।

किसान के खेत से प्राप्त सभी प्रकार के आँकड़े नैफ़ेड और आईटीएस को प्राप्त कराता है जिन्हें नैफ़ेड और आईटीएस की वेबसाइट पर देखा जा सकता है। ये आँकड़े किसानों की ट्रेसिएबिलिटी में काम आते हैं। ट्रेसिएबिलिटी इनके उत्पादों के पैदा होने से बाज़ार होते हुए उपभोक्ता तक पहुँचने और ज़रूरत पड़ने पर वापस उत्पादक तक पहुँचने की व्यवस्था है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जैविक उत्पाद का स्वाद और गुणवत्ता पारंपरिक खेती के जरिए उगाये जाने वाले उत्पाद से ज्यादा बेहतर होता है। कीटनाशक हवा के साथ-साथ मीलों तक अपना दुष्प्रभाव छोड़ते हैं इसलिए इनका असर क्षेत्र के लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है इसलिए जैविक खाद्य स्वास्थ्य के लिहाज से भी बेहतरीन होते हैं। विभिन्न शोधों से भी जाहिर हुआ है कि पारंपरिक खेती के जरिए उगाए गए उत्पादों के मुकाबले जैविक उत्पादों में विटामिन आदि की मात्रा ज्यादा होती है और इसमें रासायनिक कीटनाशक का अंश भी नहीं होता।

अब तक साधारण खेती कर रहे किसानों और अन्य जानकारों की आशंका थी कि जैविक खेती करने से उत्पादन पहले के मुक़ाबले कम हो जाएगा लेकिन उत्तर प्रदेश में जैविक खेती के प्रयोग के आँकड़े बताते हैं कि जैविक खेती के पहले साल में लगभग पहले के ही बराबर पैदावार मिली जबकि दूसरे साल में उनकी पैदावार पहले से क़रीब एक चौथाई बढ़ गई।

राष्ट्रीय बागवानी मिशन के मुख्य सलाहकार डॉ आरके पाठक का कहना है, "हमारे यहाँ जो रसायनों पर आधारित खेती हो रही थी उससे धीऱे धीरे उत्पादकता कम हो रही थी। उत्पादन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही थी और पर्यावरण प्रदूषित हो रहा था। इस वजह से हमारे नीति निर्धारकों ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के बारे में सोचा।" उन्होंने कहा, "जैविक खेती को जब शुरू किया गया तो लोगों को लगा कि क्या वाकई इससे उत्पादकता बढ़ेगी और खरपतवार ख़त्म हो जाएंगे? लेकिन हमने यह कर दिखाय। अब जो किसान जैविक खेती कर रहे हैं उनका उत्पादन रासायनिक फर्टिलाइज़रों का प्रयोग करने वाले किसानों से हर मायने में बेहतर है।"

खेतों को पूरी तरह जैविक के रूप में परिवर्तित करने के लिए किसानों को तीन साल तक पूरी तरह से जैविक खादों और जैविक कीटनाशकों का ही उपयोग करना होता है। तीन साल तक सफलता के साथ जैविक खेती करने के बाद किसानों और उनके खेतों का जैविक के रूप में किसी देशी या विदेशी सत्यापन एजेंसी से समूह प्रमाणीकरण कराया जाता है।

जैविक खेती और जैविक उत्पादों के लिए अब उपभोक्ताओं में भी जागरुकता आई है और दूसरे साधारण उत्पादों के मुक़ाबले ज़्यादा मूल्य होने के बावजूद उनका रुझान जैविक यानी ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थो में बढ़ रहा है। जैविक खाद्य पदार्थों का अलग बाज़ार बनाने के लिए स्वयंसेवी संस्था मोरारका फ़ाउंडेशन ने मुंबई में अपनी आउटलेट "डाउन टू अर्थ" खोली है। हैफेड ने भी प्रारम्भिक तौर पर पंचकूला, चंडीगढ़ और दिल्ली के बाजारों में 500 मिलीलीटर की पैकिंग में प्रमाणित जैविक सरसों तेल और 25 किलोग्राम के थैलों में हैफेड जैविक गेंहू की बिक्री शुरू की है। जैविक खेती के लिए काम करने वाली संस्था आईटीएस भी रिलायंस फ़्रेश, मदर डेयरी और स्पेंसर्स आदि रिटेल आउटलेट के साथ मिलकर भारत में किसानों के जैविक उत्पादों का एक अलग बाज़ार बनाने की कोशिशों में लगी है।
ऋचा कुलश्रेष्ठ

ऋचा कुलश्रेष्ठ दिल्‍ली में रहती हैं उन्‍होंने यह लेख मेल से खेत खलियान के भेजा है।

Monday, May 18, 2009

हर किसान पर 14 हजार का कर्ज

भोपाल । मप्र के किसानों की आर्थिक स्थिति के बारे में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आ रहे हैं। प्रदेश के हर किसान पर औसतन 14 हजार 218 रुपए का कर्ज है। वहीं प्रदेश में कर्ज में डूबे किसान परिवारों की संख्या भी चौंकाने वाली है। यह संख्या 3211000 है। खास बात तो यह है कि मप्र में शून्य से 225 रुपए मासिक प्रति व्यक्ति आय वाले किसान पर 6305 रुपए का कर्ज है। वहीं प्रदेश के 950 रुपए प्रति व्यक्ति मासिक आय वाले किसान पर 52418 रुपए कर्ज है।

मप्र के कर्जदार किसानों में 23 फीसदी किसान ऐसे हैं, जिनके पास 2 से 4 हेक्टेयर भूमि है। साथ ही 4 हेक्टेयर भूमि वाले कृषकों पर 23456 रुपए कर्ज चढ़ा हुआ है। कृषि मामलों के जानकारों का कहना है कि प्रदेश के 50 प्रतिशत से अधिक किसानों पर संस्थागत चढ़ा हुआ है। किसानों के कर्ज का यह प्रतिशत सरकारी आंकड़ों के अनुसार है, जबकि किसान नाते/रिश्तेदारों, व्यवसायिक साहूकारों, व्यापारियों और नौकरीपेशा से भी कर्ज लेते हैं। जिसके चलते प्रदेश में 80-90प्रतिशत किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं।

इसे मानवीय मुद्दा बनाएगी कांग्रेस

किसानों की आत्महत्या के लिए राज्य सरकार जिम्मेदार है। भाजपा ने विधानसभा चुनाव के दौरान किसानों के 50 हजार रुपए तक कर्ज माफी का कहा था, लेकिन यह बात भुला दी गई। जिस क्षेत्र में किसानों ने आत्महत्या की है, वहां नहर नहीं है। किसान टच्यूबवेल से काम चला रहे हैं।

उन्हें बिजली नहीं मिलती है, जबकि बिजली के बिल मिल रहे हैं। पहले जहां 30 से 40 गुना पैदावार होती थी, वहां भी यह घट गई है। ऐसे में लाचार किसान आत्महत्या के सिवाय क्या कर सकता है। कांग्रेस किसानों की आत्महत्या के मामले को राजनैतिक नहीं बल्कि मानवीय मुद्दा बनाएगी। - सुरेश पचौरी प्रदेश अध्यक्ष, कांग्रेस

पिछले दिनों भोपाल में बबलू मीणा की आत्महत्या के मामले को दबा दिया गया। जांच में कहा गया है कि वह शराबी था, लेकिन हकीकत यह है कि सरकार अधिकारियों के जरिए अपने किए पर परदा डाल रही है। किसानों की आत्महत्या का प्रमुख कारण बढ़ता कर्ज है। कांग्रेस इस मामले का फैसला जन अदालत में कराएगी। - केके मिश्रा प्रदेश प्रवक्ता, कांग्रेस

सरकार बिजली उपलब्ध कराने और कर्जमाफी का वादा भूल गई है। बनखेड़ी मामले में किसानों को बिजली नहीं मिली, लेकिन मोटी रकम वाले बिजली बिल दिए गए हैं। - अरविंद मालवीय प्रदेश प्रवक्ता, कांग्रेस

किसानों के कर्ज के मुख्य कारण

कारण - कर्ज का प्रतिशत

कृषि में पूंजीगत व्यय 47.2 कृषि में वास्तविक व्यय 21.3

गैर कृषि व्यवसायी पर व्यय 0.14

उपभोग व्यय 9.6

विवाह/सामाजिक व्यवहार पर व्यय 14.4

शिक्षा व्यय 0.01

स्वास्थ्य पर व्यय 3.6

अन्य व्यय 2.7

(नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन के नेशनल सैंपल सर्वे के 59वें चक्र के आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर)

कहां से लेते हैं किसान कर्ज

स्रोत कर्ज (प्रतिशत में)

सरकार 1.9

सहकारी समितियां 16.9

बैंक 38.1

व्यवसायिक साहूकार 22.1

व्यापारी 9.0

रिश्तेदार/मित्र 10.1

डॉक्टर/वकील 0.05

अन्य 0.08

राधेश्‍याम दांगी द्वारा लिखित यह आलेख दैनिक भास्‍कर के 6 अप्रैल के अंक में प्रकाशित हुआ था। राधेश्‍याम विकास संवाद की मीडिया फेलोशिप इन दिनों कर रहे हैं। खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर


Monday, April 20, 2009

कर्ज के फंदे में किसान

होशंगाबाद जिले के बनखेड़ी ब्लाक के कुर्सीढ़ाना के किसान अमान सिंह ने अप्रैल माह में करीना इंडोसल्फान (एक जहरीली दवा) पीकर अपनी ईहलीला समाप्त कर ली। अमान सिंह पर बैंक और साहूकार मिलाकर कुल 1.50 लाख रूपये का कर्ज था। अमान के परिवारजन बताते हैं कि उसके यहां पैदावार बहुत कम हुई थी। कर्ज चुकाने की चिंता, अमान सिंह के लिये चिता बन गई। ऐसा करने वाले अमान सिंह अकेले नहीं थे, बल्कि बनखेड़ी के ही एक और किसान मिथिलेश ने भी आत्महत्या कर ली। प्रदेश में विगत एक माह में कर्ज के कारण आत्महत्या वाले किसानों की संख्या 8 हो गई जबकि 4 अन्य किसानों ने भी आत्महत्या का प्रयास किया। इन आत्महत्याओं के साथ एक बार फिर यह बहस उपजी है कि क्या कारण है कि धरती की छाती को चीरकर अन्न उगाने वाले किसान, हम सबके पालनहार को अब फांसी के फंदे या अपने ही खेतों में छिड़्रक़ने वाला कीटनाशक ज्यादा भाने लगा है। दरअसल अभी तक किसानों की आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक का जिक्र आता रहा है, लेकिन वास्तविकता इससे बहुत परे है। मध्यप्रदेष में विगत छ: वर्षों में किसानों की आत्महत्याओं में लगातार इजाफा हुआ है। प्रदेश में विगत 8 वर्षों में 1000 से भी ज्यादा किसानों के आत्महत्या की है।

रोजाना 4 किसान करते हैं आत्महत्या

राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो की मानें तो प्रदेश में प्रतिदिन 4 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह मामला केवल इसी साल सामने आया है बल्कि वर्ष 2001 से यह विकराल स्थिति बनी है। उपरोक्त तालिका को देखें तो हम पाते हैं कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों पड़ोसी राज्यों में कमोबेश एक सी स्थिति है। यह स्थिति इसलिये भी तुलना का विषय हो सकती है क्योंकि दोनों राज्यों की भौगोलिक परिस्थितियाँ लगभग एक सी हैं, खेती करने की पध्दतियाँ, फसलों के प्रकार भी लगभग एक से ही हैं। मध्यप्रदेश ने वर्ष 2003-2004 में भी सूखे की मार झेली थी और तब किसानों की आत्म हत्याक का ग्राफ बढ़ा था और विगत् दो-तीन वर्षों में भी सूखे का प्रकोप बढ़ा ही है तो हम पाते हैं कि वर्ष 2005 के बाद प्रदेश में किसानों की आत्महत्याओं में बढ़ोत्तरी हुई है। अभी हमारे पास वर्ष 2008 के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, अतएव हम बहुत सीधे तौर पर इस ट्रैंड को पकड़ नहीं पायेंगे, लेकिन स्थिति तो चिंताजनक है। हम यह सोचकर खुश हो सकते हैं कि हमारे राज्य में महाराष्ट्र, आंध प्रदेश व कर्नाटक की तरह भयावह स्थिति नहीं हैं लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि इन राज्यों की स्थितियां हमसे काफी भिन्न हैं। और यदि आज भी ध्यान नहीं दिया गया तो प्रदेश की स्थिति और भी खतरनाक हो जायेगी।

कौन है किसान

कनाड़ा में डी -ग्रुट स्कूल आफॅ बिजनेस, मेकमास्टर यूनिवर्सिटी में पीएचडी के छात्र युवराज गजपाल की इस खोजबीन को और सामने लायें कि एनसीआरबी के अनुसार किसे किसान की श्रेणी में रखा गया है तो स्थिति ओर भी चिंताजनक रूप में सामने आती है। युवराज कहते हैं कि इसके बारे में मैंने मद्रास इंस्टीटयूट ऑफ डेवलपमेन्ट के प्रोफेसर नागराज से बात की जो कि कई सालों से किसान आत्महत्या के बारे में राष्ट्रीय अपराध ब्यूरों के आंकड़े के आधार पर विष्लेषण कर रहे हैं। प्रोफेसर नागराज बताते हैं कि पुलिस विभाग के अनुसार किसान की परिभाषा का मापदंड जनसंख्या के लिए परिभाषित किसान की परिभाषा से और भी कठिन है। पुलिस की परिभाषा के अनुसार किसान होने के लिए स्वयं की जमीन होना आवष्यक है और जो लोग दूसरे की खेती को किराये में लेकर (म.प्र क़ी परम्परा के अनुसार बटिया/ अधिया लेने वाले) काम करते हैं उन्हें किसानों की श्रेणी में नहीं रखा गया है। यहां तक कि इसमें उन लोगों को भी शामिल नहीं किया गया है जो अपनी घर के खेतों को सम्हालते हैं लेकिन जिनके नाम में जमीन नहीं है। अगर किसी घर में पिताजी के नाम में सारी जमीन है लेकिन खेती की देखभाल उसका लड़का करता है तो पिताजी को तो किसान का दर्जा मिलेगा लेकिन बेटे को पुलिस विभाग किसान की श्रेणी में नहीं रखेगी। प्रोफेसर नागराज आगे बताते हैं कि पुलिस विभाग द्वारा जिस तरह से मापदंड अपनाया गया है उस हिसाब से वास्तविक किसान द्वारा आत्महत्या की संख्या राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की संख्या से और भी ज्यादा होगी।

इसी के साथ युवराज का अगला सवाल और परेशान कर सकता है कि पुलिस विभाग से मिले यह आंकड़े कहीं गलत तो नहीं ! ज्ञात हो कि राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़े वही आंकड़े हैं जो उसे राज्य के अलग-अलग पुलिस अधीक्षक कार्यालयों से प्राप्त होते हैं। इससे अधिक प्रामाणिक जानकारी उनके पास कोई भी नहीं है। हम सभी जानते हैं कि राज्य में पुलिस व्यवस्था के क्या हाल हैं और कितने प्रकरणों को दर्ज किया जाता है। खासकर किसानों की आत्महत्या जैसे संवेदनषील मामलों को राज्य हमेषा से ही नकारता रहा है। ऐसे में एनसीआरबी की रिपोर्ट भी बहुत प्रामाणिक जानकारी हमारे समक्ष प्रस्तुत करती है, यह सोचना गलत होगा।

ये तो होना ही था

लंबे समय से किसानों की आत्महत्याओं पर लिख रहे जाने-माने पत्रकार पी. साईनाथ का कहना है कि जब मैंने इस विषय पर लिखना शुरू किया था तो लोग हंसते थे। कोई भी गंभीरता से नहीं लेता था। लेकिन यदि समये रहते प्रयास किये जाते तो हमें यह दिन नहीं देखना पड़ता कि कृषि प्रधान देश में किसानों के लिये आत्महत्या मजबूरी बन जाये। कृषि मामलों के जानकार देविन्दर शर्मा कहते हैं कि यह तो होगा ही । एक तरफ सरकार छठवां वेतनमान लागू कर रही है जिसमें एक चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी यानी भृत्य तक को 15000 रूपया मासिक मिलेगा, जबकि एनएसएसओ का आकलन कहता है कि एक किसान की पारिवारिक मासिक आय है महज 2115 रूपये। जिसमें पांच सदस्य के साथ दो पशु भी हैं। सवाल यह है कि किसान सरकार से वेतनमान नहीं मांग रहा है बल्किय वह तो न्यूनतम सर्मथन मूल्य मांग रहा है। और सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। उत्पादन लागत बढ़ रही है और किसान को सर्मथन मूल्य भी नहीं मिल रहा है।

हर किसान पर हैं 14 हजार 218 रूपये का कर्ज

किसानों की आत्महत्या के तात्कालिक 8 प्रकरणों का विष्लेषण हमें इस नतीजे पर पहुंचाता है कि सभी किसानों पर कर्ज का दबाव था। फसल का उचित दाम नहीं मिलना, घटता उत्पादन, बिजली नहीं मिलना परन्तु बिल का बढ़ते जाना, समय पर खाद, बीज नहीं मिलना और उत्पादन कम होना । म.प्र. के किसानों की आर्थिक स्थिति के बारे में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आ रहे हैं। प्रदेश के हर किसान पर औसतन 14 हजार 218 रूपये का कर्ज है। वहीं प्रदेष में कर्ज में डूबे किसान परिवारों की संख्या भी चौंकाने वाली है। यह संख्या 32,11,000 है। म.प्र. के कर्जदार किसानों में 23 फीसदी किसान ऐसे हैं, जिनके पास 2 से 4 हेक्टेयर भूमि है। साथ ही 4 हेक्टेयर भूमि वाले कृषकों पर 23,456 रूपये कर्ज चढ़ा हुआ है। कृषि मामलों के जानकारों का कहना है कि प्रदेश के 50 प्रतिशत से अधिक किसानों पर संस्थागत कर्ज चढ़ा हुआ है। किसानों के कर्ज का यह प्रतिशत सरकारी आंकड़ों के अनुसार है, जबकि किसान नाते/रिश्तेरदारों, व्यवसायिक साहूकारों, व्यापारियों और नौकरीपेशा से भी कर्ज लेते हैं। जिसके चलते प्रदेश में 80 से 90 प्रतिशत किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं।

बिजली मार रही है झटके

छत्तीसगढ़ के स्वतंत्र होने के साथ ही प्रदेष में बिजली खेती-किसानी के लिये प्रमुख समस्या बन गई है। प्रदेश में विद्युत संकट बरकरार है । सरकार ने अभी हाल ही में हुये विधानसभा चुनाव के समय ही अतिरिक्त बिजली खरीदी थी, उसके बाद फिर वही स्थिति बन गई है। प्रदेष में किसान को बिजली का कनेक्षन लेना राज्य सरकार ने असंभव बना दिया है। उद्योगों की तरह ही किसानों को खंबे का पैसा, ट्रांसफार्मर और लाईन का पैसा चुकाना पड़ेगा, तब कहीं जाकर उसे बिजली का कनेक्षन मिलेगा। बिजली तो तब भी नहीं मिलेगी, लेकिन बिल लगातार मिलेगा। बिल नहीं भरा तो बिजली काट दी जायेगी, केस बनाकर न्यायालय में प्रस्तुत किया जायेगा । यानी किसान के बेटे के राज में किसान को जेल भी हो सकती है। घोषित और अघोषित कुर्की भी चिंता का कारण है। बनखेड़ी में भी यही हुआ कि बिल जमा न करने पर एक किसान की मोटरसाईकिल उठा ले गये। भारतीय किसान संघ के प्रांतीय संयोजक दर्शन सिंह चौधरी कहते हैं कि किसान की आत्महत्या का कारण किसान को फसल का सही दाम न मिलना, बिजली ने मिलने से फसल चौपट होना, बैंकों के कर्ज वसूलने में गैरमानवीय व्यवहार आदि शामिल हैं।

ऐसा नहीं कि सरकार के पास राषि की कमी थी, बल्कि सरकार के पास इच्छाशक्ति की कमी थी। गांवों में लगातार बिजली पहुंचाने के लिए भारत सरकार ने दो अलग-अलग योजनाओं में राज्य सरकार को पैसा दिया गया। पहली योजना है राजीव गांधी गांव-गांव बिजलीकरण योजना जबकि दूसरी योजना है सघन बिजली विकास एवं पुर्ननिर्माण योजना। राजीव गांधी योजना के लिए राज्य सरकार को वर्ष 2007-2008 में 158.21 करोड़ वर्ष, 2008-09 में 165.11 करोड़ रूपये मिला। इसी प्रकार सघन बिजली विकास एवं पुननिर्माण योजना में भी वर्ष 2007-08 व 2008-09 में क्रमष: 283.11 व 374.13 करोड़ रूपया राज्य सरकार के खाते में आया। कुल मिलाकर दो वर्षों में 980.56 करोड़ रूपया राज्य सरकार को बिजली पहुंचाने के लिए उपलब्ध हुआ लेकिन इसके बाद भी न ही राज्य सरकार ने किसानों को कोई राहत दी और न ही भारत सरकार की इस राशि का उपयोग कर बिजली पहुंचाई। इतनी राशि का उपयोग कर किसानों को बिजली उपलब्ध कराई जा सकती थी, लेकिन वास्तव में ऐसा हुआ नहीं। प्रदेश के हजारों किसानों के विद्युत प्रकरण न्यायालय में दर्ज किये गये।

सर्मथन मूल्य नहीं है समर्थ

विधानसभा चुनावों के मध्यनजर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने प्रदेश के किसानों से 50,000 रूपया कर्ज माफी का वायदा किया था, लेकिन प्रदेश सरकार ने उसे भुला दिया। अब किसानों पर कर्ज का बोझ है । दूसरी ओर भारत सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण (2007-08) की रिपोर्ट कहती है कि देश के कई राज्यों में सर्मथन मूल्य लागत से बहुत कम है, मध्यप्रदेश में भी कमोबेश यही हाल हैं। समर्थन मूल्य अपने आप में इतना समर्थ नहीं है कि वह किसानों को उनकी फसल का उचित दाम दिला सके। ऐसे में ही खेती घाटे का सौदा बनती जाती है, किसान कर्ज लेते हैं और न चुका पाने की स्थिति में फांसी के फंदे को गले लगा रहे हैं। हालांकि सरकार यह बता रही हे कि हमने विगत दो सालों में सर्मथन मूल्य बढ़ाकर 750 से 1130 रूपये कर दिया है। लेकिन इस बात का विश्ले षण किसी ने नहीं किया कि वह समथ्रन मूल्य वाजिब है या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि सर्मथन मूल्य लागत से कम आ रहा है ! और वह लागत से कम आ भी रहा है लेकिन फिर भी सरकार ने इस वर्ष बोनस 100 रूपये से घटाकर 50 रूपया कर दिया।

ये कैसी आदर्श आचार संहिता

एक विडंबना और भी है कि विगत् तीन वर्षों से सूखे की मार झेल रहे प्रदेश में इस साल कमोबेश वही खस्ता हाल हैं। लेकिन लोकसभा चुनावों के मध्यनजर आदर्ष आचार संहिता लगी है और एसी स्थिति में प्रदेश में सूखा घोषित नहीं हो पा रहा है। समझ से परे यह भी है कि यह कैसा आदर्ष कि पालनहार कर्ज के दवाब से मर जाये और हम कारण ढूंढते रहें। जब तक सूखा घोषित नहीं होगा तो किसान को अपनी फसल के मुआवजे की तो चिंता नहीं होगी। लेकिन चुनाव के रंग में रंगी सरकार और विपक्ष दोनों को किसान की सुध नहीं आ रही है और किसान आत्महत्या कर रहे हैं। चुनाव आयोग को भी यह ध्यान देना चाहिये कि कौन से ऐसे मुद्दे हैं जो कि व्यापक जनहित के हैं और जिन्हें आचार संहिता के चक्र से बाहर निकालना चाहिये। नहीं तो प्रषासनिक कुचक्र में फंसा किसान यूं ही आत्महत्यायें करता रहेगा।

किसानी धीरे-धीरे घाटे का सौदा होती जा रही है। बिजली के बिगड़ते हाल, बीज का न मिलना, कर्ज का दवाब, लागत का बढ़ना और सरकार की ओर से न्यूनतम सर्मथन मूल्य का न मिलना आदि यक्ष प्रश्नत बनकर उभरे हैं। सरकार एक और तो एग्रीबिजनेस मीट कर रही है लेकिन दूसरी ओर किसानी गर्त में जा रही है। किसान कर्ज के फंदे में फंसा कराह रहा है। समय रहते खेती और किसान दोनों पर ध्यान देने की महती आवश्याकता है, नहीं तो आने वाले समये में किसानों की आत्महत्याओं की घटनायें बढेंग़ी।

प्रशान्त कुमार दुबे

प्रशान्त कुमार दुबे विकास पत्रकार हैं। वे होशंगाबाद जिले के शोभापुर के रहने वाले हैं। भोपाल स्थि त विकास संवाद नाम की एक संस्थाव के साथ काम करते हैं। विकास के मुद्दों की मीडिया में पैठ बनाने में विकास संवाद की अहम भूमिका है। खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर

Thursday, April 9, 2009

किसानों की आत्महत्या से उठे सवाल

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद ज़िले के बनखड़ी ब्लाक के एक गांव कुर्सीढाना के कृषक अमान सिंह ने अप्रैल के पहले हप्ते में जहरीली दवा पी ली जिससे अमान सिंह की मृत्यु हो गई। अमान सिंह पचास हजार ने 50 हजार का कर्ज सतपुड़ा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक से एवं करीब एक लाख साहूकारों से ले रखा था। इस वर्ष अमान सिंह के खेतों में 35 क्विंटल गेहूं पैदा हुआ जो अपेक्षा से कहीं कम था। कर्ज की चिन्ता ने अमान को आत्महत्या जैसा निर्णय लेना पड़ा। यही नहीं बनखेड़ी के दो और गांवों के किसानों ने भी आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठाने की कोशिश अप्रैल के पहले हप्ते में ही की। इन घटनाओं ने मध्य प्रदेश में किसानों के सामने आने वाले एक भावी संकट की ओर इशारा किया है।
गौरतलब है कि बनखेड़ी ब्लाक के ही ग्राम नांदना के एक किसान ने भी जहरीली दवा पी ली। किसान को तत्काल स्वास्थ्य केन्द्र ले जाया गया जहां उससे किसी तरह से मरने से बचाया जा सका। इस किसान ने कहा कि उसके खेत में इस साल केवल 12 क्विंटल गेहूं हुआ है जबकि उसे एक लाख पच्चीस हजार रुपयों का कर्ज पटाना था। विद्युत समस्या के कारण इस किसान को जनरेटर से सिंचाई करनी पड़ी जो कि काफी महंगी पड़ी। इन तमाम समस्याओं के चलते इस किसान ने आत्महत्या का रास्ता अख्तियार किया। लोगों की जागरूकता से इस किसान को बचाया जा सका। बात केवल इन दो किसानों की ही नहीं है। बनखड़ी के पास ग्राम भैरापुर के युवा किसान 22 वर्षीय मिथलेश रघुवंशी ने कर्ज में डूबने के कारण आत्महत्या कर ली थी। इस किसान की मां का कहना है कि फसल अच्छी नहीं हुई थी और और उसके बेटे पर कर्ज था जिसकी चिंता में मिथलेश ने अपनी जान दे दी। समाजवादी जन परिषद के गोपाल राठी कहते हैं कि सरकार की किसान विरोधी नीतियां ही आत्महत्या का प्रमुख कारण हैं। एक तरफ सरकार उद्योगपतियों को न्यौता दिया जा रहा है उनके साथ बिजली की आपूर्ति के लिए अनुबंध किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ किसानों को खेती के लिए पर्याप्त बिजली उपलब्ध नहीं करवाई जा रही है। किसान को क्रेडिट कार्ड बनवाने के लिए भी भटकना पड़ता है।
किसान के आत्महत्या की ये घटनाएं खेती पर मंडरा रहे खतरे के लिए आगाह करने वाली हैं। मध्य प्रदेश के कई इलाके सिंचाई के साधनों से महरूम है। छोटे-छोटे किसान सिंचाई के लिए पंपो का इस्तेमाल करते हैं। बिजली कटौती के कारण किसानों को खेतों में डीजल पंपों का उपयोग करना पड़ता है। जिसमें न केवल लागत बढ़ जाती है बल्कि कई तरह की अन्य दिक्कतों का सामना भी करना पड़ता है। पर्याप्त पैदावार न होना और कर्जों की वसूली की सख्त प्रक्रिया किसानों को मुश्किल में डालती है। फसल का दाम लागत मूल्य से भी कम मिलना खेती को घाटे का सौदा बनाता है। इसका सामना छोटा किसान करने में अक्षम है और उसे आत्महत्या की राह अपनानी पड़ रही है।
भारत सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण 2007-2008 की एक जानकारी कहती है कि भारत के कुछ राज्यों में गेहूं का समर्थन मूल्य लागत से कम है। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश भी इनमें से एक राज्य है। वस्तुत: किसान को कर्ज लेकर खेती करनी पड़ती है। मध्य प्रदेश में किसानों के कर्ज की स्थिति चौकाने वाली है। एक जानकारी के मुताबिक मध्य प्रदेश के 80 से 90 फीसदी किसान कर्जग्रस्त हैं। प्रदेश के हर किसान पर औसतन 14 हजार 218 रुपए का कर्ज है। प्रदेश के 32,20,600 किसान कर्ज में हैं। रासायनिक खादों, कीटनाशकों के लगातार बढ़ते इस्तेमाल और पैदावार में ठहराव के कारण खेती की लागत में लगातार वृध्दि हो रही है। यह एक चिन्ता का मुद्दा है। इसका एक परिणाम मध्य प्रदेश में किसानों की आत्महत्याओं की घटनाओं का बढ़ना है। पिछले साल भी कुछ किसानों की आत्महत्याओं की खबरें मिली थीं। छिंदवाड़ा, खरगौन, भोपाल, बनखेड़ी, पिपरिया और बड़वानी के किसानों ने पिछले साल आत्महत्या जैसा कदम उठाया। प्रदेश सरकार या केन्द्र सरकार दोनों ही किसानों को गुमराह करती रही हैं। पर असल में किसानों की समस्याओं को इनमें से किसी ने भी नहीं उठाया है। खेती के कंपनीकरण जैसे कदम जरूर उठाने की कोशिश पिछले दिनों की गई हैं। प्रदेश सरकार ने पिछले साल एग्री बिजनेस मीट का आयोजन करके कई कंपनियों को खेती में प्रवेश करने के लिए कई तरह के लालच देने की कोशिश की। मानसून का जुआ कही जाने वाली खेती को घाटे से उबारने के लिए तुरन्त प्रयास किए जाने की जरूरत है अन्यथा यदि खेती की तबाही को नहीं रोका गया तो अंतत: संकट पूरे देश के सामने आएगा!
शिवनारायण गौर

होशंगाबाद जिले के बनखेड़ी ब्‍लाक के दो किसानों की आत्‍महत्‍या करने तथा एक किसान के आत्‍महत्‍या करने का प्रयास करने की घटनाएं एक चिन्‍तनीय मुद्दा है। प्रदेश में किसानों के आत्‍महत्‍या की घटनाएं झकझोरने वाली हैं निश्‍िचत ही इस बारे में गम्‍भीरता से सोचा जाना चाहिए।खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर

Monday, April 6, 2009

हारवेस्टर की देन नरवाई की आग

होशंगाबाद जिले के गोलगांव के खेतों में पिछले दिनों लगी आग से 40 किलोमीटर के खेत जल गए। गेहूं को काटने के बाद खेत में छूटा गेहूं का निचला हिस्सा जिसे नरवाई कहते हैं, में लगी इस आग से छोटे-बड़े सैकड़ों झाड़-पेड़ जल गए। आग हवा के साथ फैलती गई और बीच में आने वाले कई गांवों से होती हुई आगे बढ़ गई। सिचाई पंपों और ट्रेक्टर से खेत को बखरने वाली एक मशीन कल्टीवेटर के सहारे गांवों को जलने से बचा लिया गया। खेत में आग लगने की ये पहली घटना नहीं है बल्कि यह इन दिनों अमूमन पूरे मध्य प्रदेश के गेहूं की खेती वाले इलाके की आम घटना हो गई है। हर साल कुछ गांवाेंं और जानवरों का जलना सामान्य-सी बात है। इस साल तो एक व्यक्ति के भी होशंगाबाद जिले में जलने की खबर भी अखबारों के अन्दर के पन्नों पर छपी। मसलन अब नरवाई से लगने वाली खेतों की आग बड़ा रूप लेने लगी है।
गौरतलब है कि खेतों में आग लगाने की ये घटनाएं पिछले दशेक सालों में बढ़ना शुरू हुई हैं। तीन साल पहले से तो सरकार ने भी इन घटनाओं को गम्भीरता से लिया है। अब स्थानीय प्रशासन हर साल निर्देश जारी करता है कि नरवाई में आग नहीं लगाई जाए। यदि आग लगाने वाले के बारे में जानकारी मिले तो फिर सरकार कानूनी कार्यवाही करने की बात भी करती है। किन्तु असल में ये मुद्दा इतना आसान नहीं हैं। एक बात तो यह है कि आग लगाने वाले की तलाश करना लोहे के चने चबाना जैसा है। जिस खेत से आग लगी है केवल उसके बलबूते इस बात को तय नहीं किया जा सकता है कि आग किसने लगाई है। वैसे तो ये आग खेत की नरवाई को जलाने के लिए लगाई जाती है लेकिन जब खेत में आग लगती है तो केवल नरवाई ही नहीं जलती बल्कि इससे उस जगह पर आने वाले तमाम जीव-जन्तु, पक्षी और यहां तक की जमीन तक जल जाती है। खेती के जानकार कहते हैं कि खेतों की आग के कारण जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने वाले जीवाणु दम तोड़ रहे हैं। यही नहीं इससे वातावरण भी प्रदूषित हो रहा है।
यदि असली समस्या की जड़ को पहचानने की कोशिश की जाए तो असल में खेती में आधुनिक मशीनों का उपयोग इसका एक बड़ा कारण दिखाई देता है। हार्वेस्टर के विकास ने इस समस्या को बढ़ाया हैं। पहले जब गेहूं की फसल को हाथों से काटा जाता था तब तो नरवाई का केवल चार पांच इंच का बहुत छोटा हिस्सा जमीन में रहता था जो कि बखरनी के समय खत्म हो जाता था। इसे अलग से हटाने की जरूरत नहीं होती थी। लेकिन हार्वेस्टर से कटाई के कारण नरवाई का एक बड़ा भाग, तकरीबन दस से बारह इंच का जमीन में छूट जाता है। इस बड़े भाग के कारण खेतों को बखरना आसान नहीं होता इसलिए इस समस्या से निजात पाने के लिए किसान इस नरवाई को जला देता है। जब इसमें आग लगाई जाती है तो उसे नियंत्रित करना मुश्किल काम होता है। इसका अच्छा खासा उदाहरण गोलगांव में लगी आग है जो कि चालीस किलोमीटर तक फैल गई। केवल नरवाई की आग का ही मसला नहीं है असल में हार्वेस्टर की कटाई ने जानवरों के लिए उपलब्ध होने वाले भुसे का संकट भी पैदा किया है। चूंकि जिस नरवाई से भुसा बनता था उसे अब जमीन में छोड़ना पड़ रहा है। आजकल एक नई भुसे बनाने की मशीन को भी इजाद किया गया है जिसका इस्तेमाल खेती में किया जा रहा है। किन्तु नरवाई की समस्या का समाधान इस मशीन से भी पूरी तरह से सम्भव नहीं हैं। असल में एक तो हर किसान इस मशीन का उपयोग नहीं करता और दूसरा इसका खर्चा अलग से लगता है।
फसल चक्र में आया बदलाव भी आग का एक बड़ा कारण है। दरअसल पहले मिश्रित खेती की जाती थी। इससे आग लगने का खतरा कम रहता था। यदि आग लगती भी थी तो एक खेत से दूसरे खेत में आग लगने का कोई खतरा नहीं रहता था। परन्तु वर्तमान समय में एकल खेती करने के कारण रबी के सीजन में चारों तरफ गेंहू ही गेंहू नजर आता है। कटाई के बाद किसान को सबसे अच्छा तरीका नरवाई में आग लगाना ही सूझता है।
मशीन का अंधाधुन्ध इस्तेमाल कई समस्याओं को पैदा कर रहा है ऐसे में इस पर विचार करने की आवश्यकता है कि मशीन का कितना व कैसा उपयोग किया जाए। मशीनों के निर्माण के काम में लगे लोग प्रयोग करके देखकर नई मशीनों को तैयार करें तो इस तरह के भावी संकट से बचा जा सकता है। किसानों को भी इस दिशा में सोचना चाहिए कि अपनी जमीन की उर्वरा शक्ति को नष्ट होने और पर्यावरण को कैसे प्रदूषित होने से कैसे बचाया जाए?
शिवनारायण गौर

गर्मी के दिनों में ग्रामीण इलाकों की एक बड़ी खबर आग लगने की घटनाओं की होती है। इन दिनों खेतों में गेहूं की नरवाई में आग लगाना आम बात है और इससे कई तरह की विकराल समस्‍याएं पैदा हो रही हैं। खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर

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Friday, March 27, 2009

भूख के मामले में विश्व में भारत का प्रथम स्थान

ग्रामीण गरीबी दूर करने में भारत पिछड़ रहा है। यहां 23 करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं जो विश्व भर में सबसे ज्यादा है। भारत में बच्चों की कुल मौतों में से 50 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के कारण मरते हैं। जबकि प्रत्येक तीसरे व्यस्क व्यक्ति का वजन कम होता है।
यह बात ग्रामीण भारत के खाद्य सुरक्षा की हालत के बारे में एक अध्ययन रिपोर्ट में कही गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यद्यपि मुद्रास्फीति जुलाई, 2008 में 12 प्रतिशत थी, जो 13 साल में सबसे ज्यादा थी, जनवरी, 2009 में घटकर 5 प्र्रतिशत रह गई, लेकिन इस अवधि में खाद्यान्नों की मुद्रास्फीति 5 प्रतिशत से बढ़कर 11 प्रतिशत हो गई जो दो गुना से भी अधिक है। वर्ष 2008-2009 में खाद्यान्नों की पैदावार रिकार्ड 228 मिलियन टन होने की उम्मीद है लेकिन 2015 तक देश की आबादी की जरूरत 250 मिलियन टन से ज्यादा होगी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 119 देशों के ग्लोबल हंगर इन्डेक्स में भारत का स्थान 94वां है। संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्लूएफपी) द्वारा जारी इस रिपोर्ट में कुछ चौकाने वाली बातें बातें कही गई हैं। इसमें कहा गया है कि विश्व की कुपोषण जनसंख्या का 27 प्रतिशत से अधिक भारत में है, देश के 43 प्रतिशत बच्चे (5 साल से कम उम्र के बच्चे) कम वजन के हैं। यह आंकड़ा विश्व में सबसे ज्यादा है। तथा वैश्विक औसत 25 प्रतिशत से भी काफी अधिक है। कम वजन वाले बच्चों का भारत का प्रतिशत सब-सहारा, अफ्रीका से भी अधिक है।
रिपोर्ट के अनुसार 70 प्रतिशत से अधिक बच्चों में खून की कमी रहती है और 80 प्रतिशत बच्चों को विटामिन पूरक उपलब्ध नहीं है। इसमें कहा गया है कि पिछले छह सालों मे खून की कमी वाले बच्चों की संख्या में 6 प्रतिशत की वृध्दि हुई। 19 में से 11 राज्यों में 80 प्रतिशत बच्चों में खून की कमी है।
शारीरिक रूप से कमजोर महिलाओं का प्रतिशत पिछले छह सालों में 40 प्रतिशत बना हुआ है तथा ऐसी महिलाओं की सख्या असम, बिहार, मध्य पद्रेश और हरियाणा में बढ़ रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में महत्वाकांक्षी लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली विफल होती जा रही है। खाद्यान्न सब्सिडी कम करने का लक्ष्य प्राप्त करने के अलावा इससे बड़े पैमाने पर गरीब वर्गो के लिए खाद्य असुरक्षा की स्थिति भी पैदा हुई।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के साथ एक अन्य समस्या है किसी एक परिवार को कितना खाद्यान्न मिलना चाहिए। शुरू में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवार के लिए प्रतिमाह 10 किलो अनाज आवंटित किया गया। पांच सदस्यों वाले परिवार के लिए यह प्रति व्यक्ति 2 किलो होता है। जबकि आईसीएमआर की सिफारिश के अनुसार यह प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह 11 किलो यानी 5 सदस्यों वाले परिवार के लिए 55 किलो होना चाहिए। 2001 के केन्द्रीय बजट में इसे बढ़ाकर प्रतिमाह 20 किलो तथा अप्रैल 2002 में इसे और बढ़ाकर 35 किलो किया गया।
रिपोर्ट में भूख और गरीबी की सरकार की परिभाषा पर भी सवाल उठाया गया है। प्रो. एमएस स्वामीनाथन का कहना है कि पोषाहार सुरक्षा का मतलब है प्रत्येक बच्चे, महिला और पुरूष को संतुलित भोजन, स्वच्छ पेयजल, सफाई तथा प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध होना चाहिए।
रिपोर्ट में कहा गया है कि लगभग 80 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के घरों में शौचालय नहीं है। छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उड़ीसा और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में यह संख्या 90 प्रतिशत से अधिक है।
भारत में 5 साल से कम उम्र के 48 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के कारण शारीरिक एवं मानसिक रूप में कम विकसित होते हैं। यह विश्व में सबसे ज्यादा है। स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश का हर दूसरा बच्चा शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता है।
रौन्तेय सिन्हा

यह आलेख मुक्ति संघर्ष साप्ताहिक के 22-28 मार्च, 2009 के अंक में प्रकाशित हुआ है। अखबार से साभार इसे हम यहां प्रसारित कर रहे हैं। उम्मीद है आपके लिए उपयोगी जानकारी वाला होगा। धन्यवाद।खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर

Saturday, March 14, 2009

चार किसानों की विजय

रतलाम जिले के नयापुरा गांव में रहने वाले कृषक श्री दुलेसिंह इसी गांव के किसान धुलचन्द व अमरसिंह और रतलाम जिले के भवानीपुरा गांव के किसान मांगीलाल में एक समानता है। ये वे किसान हैं जो कपास की खेती करतहैं। इन चारों किसानों ने करीब चार साल पहले अपने खेत में कपास के बुलेट 707 नामक बीज को बोया था। लेकिन कम्पनी के वायदे के मुताबिक जब उनके कपास की पैदावार नहीं हुई तो चारों ने जिला उपभोक्ता फोरम में कम्पनी के विरूद्ध मुकदमा दायर कर दिया। शीघ्र ही वे यह मुकदमा जीत भी गए। लेकिन पैसा कम होने के कारण उन्हें राज्य स्तरीय आयोग में मुकदमा फिर से डाल दिया और वे जीत गए। इन चारों किसानों की एक जैसी कहानी उनकी जागरूकता और आम उपभोक्ताओं के लिए उपयोगी है।
इन चारों किसानों ने कपास के बीज रतलाम की ही एक मेसर्स मयुर एजेंसी से खरीदे थे। बीज को तैयार करने वाली सिकन्दराबाद की कावेरी सीड्स कंपनी लिमिटेड थी। जब किसानों ने ये बीज खरीदे थे तब कम्पनी ने वायदा किया था कि प्रत्येक पौधे में 120 से 150 डेण्डू (घेटे) एवं 20 से 25 क्विंटल कपास का उत्पादन होगा। लेकिन जब किसान ने इस बीज को लगाया तो उसके खेत में एक पौधे में केवल 12 से 19 डेण्डु ही लगे। डेण्डू कम लगने के कारण उत्पादन कम तथा घटिया होने की सम्भावना थी। इन किसानों ने इस बात की शिकायत अनुविभागीय अधिकारी, कृषि से की। उनकी इस शिकायत पर कार्यवाई करते हुए कपास की उक्त फसल का वैज्ञानिकों द्वारा निरीक्षण कियगया। वैज्ञानिकों की इस रिपोर्ट के मुताबिक उक्त प्रजाति के कपास के पौधों में शाखाएं सामान्य से काफी कम हैं तथा डेण्डू की औसत संख्या 10 से 12 प्रति पौधा है। फसल की वर्तमान स्थिति को देखते हुए इससे प्राप्त होने वाली उपज में से सामान्य 60 से 70 प्रतिशत तक कम होना सम्भावित है। उत्पादन कम होने की सम्भावना के बावजूद भी किसानों ने अपेक्षित कीटनाशक आदि का इस्तेमाल किया और इसके सबूत के लिए कीटनाशकों की खरीदी रसीद व खेत में डालने के बाद उसका पंचनामा बनवाया ताकि जरूरत होने पर वे इसका उपयोग कर सकें।
गौरतलब है कि कावेरी कम्पनी ने अपने बीज के प्रचार प्रसार हेतु जो पंपलेट छपवाया था उसके अनुसार फसल की अवधि 140 से 150 दिन, पौधे की उंचाई 4 से 5 फिट, डेण्डु का वजन 6 ग्राम तथा डेण्डु की संख्या 120 से 150 प्रति पौधा आदि जानकारी दी गई थी। लेकिन जब इन वायदों के मुताबिक पौधे तैयार नहीं हुए तो किसानों को इस बात का एहसास हो गया कि ये बीज निम्न और घटिया किस्म का हैं। और अंतत: वैसा ही हुआ। जब कपास का उत्पादन हुआ तो न तो उसकी गुणवत्ता अच्छी थी और न ही पैदावर पर्याप्त हुई थी।
किसानों ने बीज खराब होने की शिकायत उप संचालक, कृषि रतलाम को भी इस बात की शिकायत की थी। उप संचालक की शिकायत के बाद वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी एवं अनुविभागीय अधिकारी, कृषि रतलाम ने कपा कका निरीक्षण किया। उन्होंने जो रिपोर्ट सौंपी उसके मुताबिक फसल के निरीक्षण में उन्होंने पाया कि कपास की पौधे में एक ही शाखा है। तथा डेण्डू गिनने पर औसतन 10 से 12 ही पाए गए हैं जिससे निश्चित ही उत्पादन प्रभवित हो रहा है।
उत्पादन अच्छा और उत्तम गुणवत्ता का नहीं होने पर ये चारों किसान अपनी शिकायत लेकर जिला उपभोक्ता फोरम में गए। किसानों द्वारा प्रस्तुत किए गए सभी दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर फोरम ने पाया कि किसान को कम्पनी के द्वारा बेचा गया बुलेट 707 शंकर कपास बीज उत्तम गुणवत्ता का न होने के कारण बीज के सम्बन्ध में कम्पनी के वायदे के मुताबिक उत्पादन नहीं हुआ। इसकी भरपाई के लिए फोरम ने कम्पनी को कहा कि वो चारों किसानों को अलग अलग दस से पन्द्रह हज़ार की राशि दे। पर बात यहीं खत्म नहीं हुई कम्पनी भी यह राशि देने के लिए तैयार नहीं हुई और उसने अपनी अपील मप्र राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतिपोषण आयोग में कर दी। लेकिन वहां से उनकी अपील खारिज हो गई। पर किसान भी उन्हें भरपाई के लिए मिलने वाली राशि से सन्तुष्ट नहीं थे उन्होंने इस राशि को बढ़ाए जाने के लिए अपनी अपील राज्य उपभोक्ता आयोग में की।
इस अपील को मप्र राज्य उपभोक्ता विवार प्रतिपोषण आयोग ने स्वीकार कर लिया। शीघ्र ही इसका फैसला भी हो गया। फैसला किसानों के पक्ष में था। आयोग ने माना कि घटिया बीज के कारण किसान को कपास की पैदावार पर्याप्त नहीं मिली। वस्तुत: फोरम ने कम्पनी को निर्देश दिए कि वो उक्त चारों किसानों को 20 से 25 हजार रुपए उनके घाटे के भरपाई के लिए दे। किसानों की ये विजय उनके संघर्ष और जागरूकता दोनों का बखान करती है।

विश्‍व उपभोक्‍ता दिवस के मौके पर विशेष। उक्त लेख की जानकारी म.प्र. राज्य/ उपभोक्ताक विवाद प्रतिपोषण आयोग, के निर्णय के आधार पर खेत खलियान की ओर से शिवनारायण गौर